व्यवहारिक जीवन में उतारना है श्रीमद्भागवत कथा की सार्थकता : पं विद्याधर भारद्वाज
ज्ञान द्विवेदी INewsUP
कलवारी बस्ती । रामकथा हमें जीवन जीने की कला सिखाती है तो भागवत कथा हमे मोक्ष प्रदान करती है। भागवत कथा की सार्थकता तभी सिद्व होती है जब इसे हम अपने ब्यवहारिक जीवन में उतारते हैं। अन्यथा यह कथा केवल मनोरंजन मात्र बनकर रह जाती है। भागवत कथा श्रवण से मन का शुद्विकरण तो होता ही है इससे संशय भी दूर हो जाता है और मन को शान्ती मिलती है। ईश्वर से सम्बन्ध जोड़कर हम हमेंशा के लिए उन्हें अपना सकते है। भागवत कथा कल्पबृक्ष के समान है। यह सदविचार अवध धाम से आये कथा वाचक पं विद्याधर भारद्वाज जी ने प्रवचन सत्र में व्यक्त किया। वे बुद्धवार को उपाध्याय भवन सुभावपुर में चल रही नौ दिवसीय श्रीमद भागवत कथा के दूसरे दिन ब्यास पीठ से श्रद्धालुओं को भागवत कथा की महत्ता पर प्रकाश डाल रहे थे। उन्होने कहा कि राजा परीक्षित ने लोक कल्याण के लिए श्री शुकदेव जी से प्रश्न किया कि म्रियमाण ब्यक्ति का क्या कर्तब्य है। भयग्रस्त प्राणी को मृत्यु के भय से मुक्त होने के लिए परमात्मा के शरण मे रहकर उनके महिमा का गुणगान करना चाहिए । इससे भगवान के स्वाभाव व स्वरुप का ज्ञान होता है । कथा में मुख्य यजमान निगम नाथ उपाध्याय, यज्ञाचार्य कन्हैया शास्त्री, वैध प्रसाद मिश्रा, अखिलेश चौधरी, बलिराम चौधरी, प्रेम प्रकाश चौधरी, रामउग्रह चौधरी, राधेश्याम त्रिपाठी, घनश्याम त्रिपाठी, काली प्रसाद मौर्य, राम प्रकाश मौर्य, सुनील कुमार मौर्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
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