यहीं भुगतान पड़ता है पापकर्म का फल-- पं. श्रीधर
सरताज आलम INewsUP
बस्ती । देवापार में भागवत कथा के दूसरे दिन पंडित चंद्रधर द्विवेदी राजा परीक्षित की श्राप कारण बताते हुए कहा कि अन्याय पूर्वक कमाए हुए धन को प्रज्ञा एवं सन्तान कष्ट भोगना पड़ता है। राजधर्म से बढ़ कर राष्ट्र धर्म है। राजा परीक्षित जब शिकार के लिए निकले उनके सिर पर जरासन्धु का मुकुट था। जो कि अन्या की राजा थे। कलयुग उसपे सवार हो गया और राजा ने एक ऋषि के गले में मरे सर्प की माला पिन्हा दी।और उन्हें श्राप हो गया। और ज्यों ही आकद के राजा ने मुकुट उतारा तो ज्ञान हो गया भागवत कथा से पाप का प्रलाक्षन किया। रामायण में रावण ने विभीषण का महाभारत में दुर्योधन ने विदुर जी का अपमान कि उनका विनाश हो गया संत और भंगवत की परीक्षा नहीं लेना चाहिए । ये पृथ्वी पर मानव जाति के हित के लिए ही आते हैं। धर्म की स्थापना करना ही इनका कार्य है। भागवत कथा दैहिक दैविक भौतिक तीनो दूर करती है।संत की कृपा से ही धार्मिक पूजा पालक होते हैं।जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।सो नृप अवस नरक आधिकारी। प्रजा पालक राजा इतिहास उदाहरणार्थ नाम अमर हो जाता है श्री द्विवेदी ने त्याग को प्रथम राज धर्म बताया। कथा में प्रमुख यजमान अमरनाथ गौड़, सुरेंद्र कुमार, बासमती, वीरेंद्र कुमार,सरिता,दिव्या, आदर्श, रोशनी, अनुकृत, चांदनी अंकित तमाम भक्तगण कथा का रसपान किया।
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